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जौनपुर साहित्‍य के पन्‍नों में

             जौनपुर जनपद का अनूठा इतिहास प्राचीन, ऋषि- मुनियों से संचित, समृद्ध, पौरातन्‍य के स्‍वाभिमान से उन्‍नतशील, मध्‍ययुगीन उलटफेर से विधकित, विदेशी सत्‍ता के विरूद्ध क्रान्तिकारी स्‍वतन्‍त्र सूरमाओं के कथा स्‍फूलिगो से ल्‍योतिष तथा आ‍धुनिकताग्रही जीवन चेष्‍टाओं से अंकित रहा है। मध्‍यकाल में जौनपुर की शैक्षिक उपलब्धियों एव मधुरिया रागिनीमय संगीतिक उत्‍कर्ष, प्राकृतिक सौन्‍दर्य और प्रसिद्धी को सुनकर कबीर, नानक, जायसी जैसे ज्ञानी पुरूष इसे सजोने की स्‍पृहा का सन्‍वरण नही कर सके थे। जनपद में शेख नबी कुतवन, नूर मोहम्‍मद, आलम, मंथन, बनारसी दास जैन,  उरस्‍ट मिश्र, संत दाई दयाल आदि ने पन्‍द्रहवीं शताब्‍दी से लेकर उन्‍नीसवीं सदी के पूर्वाद्ध तक अपनी कविताओं, छंदों और प्रेम व्‍यंजनाओं द्वारा आत्‍मा- परमात्‍मा, लोक-परलोक और नीति कार्यो की व्‍याख्‍या की।

    मैथिल कोकिल विद्यापति ने 1360- 1450 ई0 में कीर्तिलता की रचना की। कविता के छायाकारी धरातल पर आते-आते स्‍वर्गीय रामनरेश त्रिपाठी, गिरजा दत्‍त शुक्‍ल गिरीश, अम्बिका दत्‍त त्रिपाठी, डा0 क्षेम ने मानवता को शांतिपूर्ण धरातल प्रदान किया। स्‍वर्गीय गिरीष ने महाकाव्‍य लिखकर सनातन, सांस्‍कृतिका को उपमा प्रदान की। डा0 श्रीपाल सिंह क्षेम ने एवं पं0 रूप नरायण त्रिपाठी ने अपनी रचनाओं द्वारा साहित्‍य को गौरव प्रदान किया। डा0 क्षेम को साहित्‍य महारथी, साहित्‍य भूषण, सहित्‍य वाचस्‍पति आदि अनेको उपलब्धियों से विभूषित किया जा चुका है। उनके शब्‍द कबूतर की तरह उड़ते है और मिट्टी की ध्‍यान रम गये लगते है। यथार्थ से निकलकर कविता की डालियों में झूमकर सहित्‍य की गन्‍ध फैलाते है। स्‍वर्गीय पं0 रूपनरायण त्रिपाठी की रचनाओं ने इस जनपद की माटी की सुगन्‍ध को अनवरत साहित्‍य में विखेरने का प्रयास किया। सहज एवं सरल भाषायें, आंचलिक बोलियां समेटे उनके काव्‍य सहित्‍य की अमूल्‍य निधि है। नई पीढ़ी में डा0 रवीन्‍द्र भ्रमर, मार्कन्‍डेय, डा0 विश्‍वनाथ, अजय कुमार, डा0 लाल साहब सिंह, डा0 राजेन्‍द्र मिश्र, स्‍वर्गीय सरोज आदि अनेक समीक्षक रचनाकारों ने अपनी रचनाओं एवं लेखो द्वारा समाज में बिखराव से उत्‍पन्‍न संवेदनात्‍मक प्रतिक्रिया, कुरीतियों, उत्‍पीड़न आदि के विरूद्ध जाग्रत को विभिन्‍न कोणो से उजागर किया है।

    हिन्‍दी रचनाकारों की तरह उर्दू कवियों एवं शायरों की रचनाओं में भी ईश्‍वरीय सत्‍ता प्रेम, गाथाकारों का सुफियाना भाव दृष्टिगोचर होता है। स्‍वर्गीय कामिल शफीकी, चरन शरन नाज, हाफिज मोहम्‍मद, अदीम जौनपुरी, स्‍वर्गीय फजले हाजी, शायर जमाली शफीक, बरेलवी आदि अनेक लोगों ने अपने कलामों से उर्दू अदब को गौरव प्रदान किया है। वामिक जौनपुरी ने उर्दू अदब को जो गौरव दिया है वह सदैव याद किया जायेगा। सन् 1942-1945 के बीच भूखा बंगाल और मीना बाजार कवितायें देश भर में लोकप्रिय हुई

    जनपद जौनपुर में ऐसे कई सहित्‍यकार, शायर एवं अन्‍य भूले बिसरे है, जिनका नाम बड़े ही गर्व से लिया जाता रहा है, उसी में एक ऐसा नाम सामने आया है जो बहुत कम लोग ही जानते है। शौकत परदेशी एक ऐसा नाम है, जो जनपद में ही नही परदेश एवं देश के साहित्‍यकारों और शायरी से जुड़े लोगों में बेहद मशहूर रहा है। कविता, पत्रकारिता और शेरो-शायरी के माध्‍यम से जौनपुर की माटी का नाम रौशन करने वालो में मुहम्‍मद इरफान ऊर्फ शौकत परदेशी का नाम बड़े इज्‍जत के साथ लिया जाता है। यह पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के पहले शायर है, जिन्‍हे हिज मास्‍टर्स वायस रिकार्डिग कम्‍पनी ने अनुबन्धित किया। श्री परदेशी की भाषा और शैली इतनी लोकप्रिय रही कि पुराने लोग उन गीतों को बराबर गुनगुनाया करते है। 


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